Fatehpur: मनरेगा योजना, जो गांवों में विकास और गरीब मजदूरों की रोज़ी-रोटी का सबसे बड़ा सहारा मानी जाती है, अब भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा अड्डा बन गई है। ताज़ा खुलासे फतेहपुर जिले से सामने आए हैं, जहाँ पंचायत प्रतिनिधियों और अफसरों की मिलीभगत से करोड़ों रुपए की मनरेगा धनराशि हड़प ली गई।
सरकंडी से खुला घोटाले का पिटारा
असोथर विकास खंड के सरकंडी गांव में भ्रष्टाचार की शिकायत के बाद जांच शुरू हुई तो परत दर परत बड़े घोटाले सामने आने लगे। यहां से शुरू हुई पड़ताल ने पूरे जिले की पंचायतों में मनरेगा की हकीकत उजागर कर दी।
कैसे होता है खेल?
बोगस जॉब कार्ड: मजदूरों के नाम पर फर्जी जॉब कार्ड बनाए गए।
बिना काम किए भुगतान: मजदूरों को काम पर बुलाए बिना उनके खाते में पैसा भेजा गया।
कमीशन सिस्टम: मजदूरों को केवल ₹500-1000 थमाकर उनकी पूरी मजदूरी प्रधान और उसके लोग वसूल लेते थे।
मिलीभगत: इस भ्रष्टाचार की कड़ी में ग्राम प्रधान, रोजगार सेवक, कंप्यूटर ऑपरेटर और बीडीओ तक शामिल पाए गए।
करोड़ों की रकम खपाई गई
जांच रिपोर्ट के अनुसार, 2021-22 से 2024-25 तक मनरेगा में गांव-गांव करोड़ों रुपये खर्च दिखाए गए।
बहादुरपुर: ₹1.46 करोड़
भीखमपुर: ₹1.42 करोड़
मंसूरपुर: ₹1.40 करोड़
मिस्सी: ₹1.19 करोड़
टिकरी मनौटी: ₹2.53 करोड़
खांडे देवर: ₹1.82 करोड़
इसके अलावा शिवरी, मंडरांव, तेंदुली, अमेना, बरदरा, बेहटा, बेनू, भेवली, हसनपुर और टांडा अमौली जैसी पंचायतों में भी भारी धनराशि खर्च कर दी गई, लेकिन ज़मीनी विकास का कोई ठोस काम नज़र नहीं आया।
अफसरों की चुप्पी पर सवाल
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह भ्रष्टाचार केवल प्रधानों तक सीमित नहीं है। अफसरों की चुप्पी और कमीशनखोरी ने इस घोटाले को पनपने दिया। बीडीओ और रोजगार सेवक से लेकर कंप्यूटर ऑपरेटर तक, सभी पर उंगलियां उठ रही हैं।
बड़ा खेल, बड़ी जांच
ग्रामीण विकास मंत्रालय को भेजी गई रिपोर्ट में साफ़ लिखा है कि फतेहपुर जिले की 816 ग्राम पंचायतों और क्षेत्र पंचायतों में हर साल करीब 400 करोड़ रुपये मनरेगा में खर्च दिखाए जाते हैं। अगर टॉप-10 ग्राम पंचायतों के कामों की गहन जांच हो, तो करोड़ों का घोटाला और सामने आ सकता है।








