भगरपुर (बिहार)। राज्य सरकार ने ऊर्जा क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अडानी पावर लिमिटेड को भगरपुर जिले के पिरपैंती क्षेत्र में 2,400 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट स्थापित करने के लिए भूमि आवंटित की है। इस परियोजना के लिए लगभग 1,020 एकड़ भूमि 33 साल की लीज पर दी गई है।
परियोजना की रूपरेखा
अडानी ग्रुप यहां अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट स्थापित करेगा।
कुल 2,400 मेगावाट (3×800 MW) क्षमता का यह प्लांट होगा।
परियोजना की अनुमानित लागत करीब 3 अरब डॉलर (लगभग 25,000 करोड़ रुपये) बताई जा रही है।
अडानी पावर का दावा है कि यह संयंत्र बिहार की बिजली ज़रूरतों को पूरा करने में मददगार होगा और राज्य की ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूत करेगा।
भूमि और किसानों का मुद्दा
परियोजना के लिए अधिग्रहित भूमि में से 915 किसान/जमीन मालिकों की निजी ज़मीन शामिल है, शेष सरकारी ज़मीन है।
किसानों का कहना है कि उन्हें अभी तक पूरा मुआवज़ा नहीं मिला है।
स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि यह ज़मीन बहुत ही कम कीमत पर दी गई है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा है कि भूमि “नाममात्र के शुल्क” यानी लगभग ₹1 प्रति वर्ष के टोकन अमाउंट पर दी गई है।
पर्यावरणीय चिंता
परियोजना क्षेत्र में बड़ी संख्या में आम के बाग़ और अन्य हरे पेड़ मौजूद हैं।
सोशल मीडिया पर यह दावा हो रहा है कि “10 लाख आम के पेड़ काटे जाएंगे”, हालांकि सरकारी या स्वतंत्र स्रोतों से इस दावे की अभी पुष्टि नहीं हुई है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि इतनी बड़ी परियोजना से स्थानीय पारिस्थितिकी और भूजल पर गहरा असर पड़ेगा।
सरकार और कंपनी का पक्ष
बिहार सरकार का कहना है कि यह परियोजना राज्य के लिए रोज़गार और बिजली आपूर्ति दोनों क्षेत्रों में बड़ा बदलाव लाएगी।
अडानी पावर की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि कंपनी “सभी क़ानूनी प्रक्रियाओं का पालन कर रही है और किसानों को उचित मुआवज़ा दिया जाएगा।”
कंपनी ने दावा किया कि स्थानीय लोगों के लिए हज़ारों नौकरियाँ पैदा होंगी और बिजली की दरें स्थिर रखने में मदद मिलेगी।
स्थानीय प्रतिक्रिया
किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे “सौदेबाज़ी पर सवाल उठाने वाली डील” बताया है।
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार ने उद्योग को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों और पर्यावरण को नज़रअंदाज़ किया है।
कई संगठनों ने मांग की है कि पेड़ों और पर्यावरण पर असर की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
निष्कर्ष
भगरपुर की यह परियोजना बिहार की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है, लेकिन भूमि अधिग्रहण, मुआवज़ा और पर्यावरण से जुड़े सवाल फिलहाल अनुत्तरित हैं।
किसानों और पर्यावरणविदों की चिंताओं का समाधान किए बिना यह परियोजना आगे बढ़ी तो विवाद और गहरा सकता है।










